Tuesday, 22 November 2016

मेरी आँखों से वो मंज़र क्यूँ दूर नही जाता

मेरी आँखों से वो मंज़र क्यूँ दूर नही जाता
तुम्हारे कदमों में हमने जब टेका था माथा

हमारी बेवकूफी थी या चाहत का था पागलपन
तुम्हे जब मान बैठे थे अपना भाग्य विधाता 

Tuesday, 5 March 2013

देखता हूँ कब तक मेरी ख़ुशी बनकर रहोगे

देखता हूँ कब तक मेरी ख़ुशी बनकर रहोगे
कब तक हवा बनकर मेरी सांसो में बहोगे
मजाक है तो अभी से कदम हटा लो पीछे
बाद में वरना तुम भी मुझे बेवफा कहोगे

Thursday, 8 March 2012

तुम्हारी नाक पर गुस्सा क्यूं हर वक्त रहता है

तुम्हारी नाक पर गुस्सा क्यूं हर वक्त रहता है
मुझे लेकर तेरा लहजा बड़ा ही सख्त रहता है

मुझे सचमुच में खो दोगी एक दिन सच्ची कहता हूँ
तुम्हारी बेरुखी से तंग तुम्हारा भक्त रहता है
*********************************************
जो सच में प्यार है मुझसे तो इतना क्यूं चिल्लाती है
मेरी हर बात के पीछे तू शक काहे जताती है

हजारों बार बोला है नही तुझको दगा दूंगा
मेरे विश्वास की धज्जी तू पल पल क्यूं उड़ाती है
*********************************************
नही मुझ पर यकीं तुझको तो चल इक काम करता हूँ
कलम करके मेरा ये सर तेरे कदमों में धरता हूँ

तुम्हारे इक इशारे पर तबाह खुद को मैं कर लूँगा
नही बेकार में तेरे लिए मैं आहें भरता हूँ
*/*********************************************
ना जाने क्यूं तुझे मुझ में अब शराफत नही दिखती
तुम्हारी आँख में पहले सी वो चाहत नही दिखती

तुम्हे ही सोचता रहता हूँ उठते बैठते जानम
इन दिनों रूह तडफती है कही राहत नही दिखती
************************************************
मुझे नाराज होना ही अगर आता तो बतलाता
तडफ का झोंका जुदाई में तुम्हारी और भिजवाता

अगर आंसू भी आते तो मैं कहता लोगों से हंसकर
घरेलू मसला है यारों नही है इश्क का खाता

Friday, 21 October 2011

क्यूं

क्यूं हर वक्त खुले रहते हैं गेसू तुम्हारे
किसके लहू से धोने की कसम खाई हैं
सब बयाँ कर दिया हैं बोझिल आँखों ने
शायद आपने न सोने की कसम खाई हैं

Friday, 16 September 2011

पैराहन नही सोच है शान मुफलिसी की










13
जो जानते है हकीकत में हाल मुफलिसों का
उठाते है सरे बज़्म वो सवाल मुफलिसों का
दिलाकर ही छोड़ते है हक परस्तों को हक
रखते है जो अक्सर ख्याल मुफलिसों का
14
पैराहन नही सोच है शान मुफलिसी की
रखियेगा पास सदा आन मुफलिसी की
अमीरी का लबादा ओढने वालों सुनों
बातों में छिपी है पहचान मुफलिसी की
15
मुफलिसों का इतना ही कसूर होता है
बनावटी पन उनसे थोडा दूर होता है
नही बहा पाते मगरमच्छ के आंसूं
दिल उनका मजबूरियों से चूर होता है


 

Tuesday, 13 September 2011

वरना उम्र को चाव से खाता है गम


10
कौम ओ- मजहब की सोचने वाले
होते है तन के उजले मन के काले
कितना ही यकीन कीजिये इन पर
नही बदलते है ये व्यवहार में साले
11
मेरा कल मेरे आज की आस में है
फिर मुझसे जुड़ने के प्रयास में है
मन का कच्चापन कहीं लें ना डूबे
फिर धडकने रूह के विश्वास में है
12
सोचोगे जैसा वैसे पेश आता है गम 
हर शख्स को यही समझता है गम
दिल से ना लगाओ हर बात दोस्तों
वरना उम्र को चाव से खाता है गम







Saturday, 10 September 2011

मैं पहली ही अंगड़ाई में उसे सब बताऊंगा



7
मुझे यूं देखते है जैसे देखते नही 
नजर मेरी हालत पर फैंकते नही
इसे उनकी अदा कहूं या बेरुखी
जख्म देकर वो कभी सेंकते नही
8
दिल और दिमाग को घायल कर दे तो अच्छा
ये इश्क मुझको यारों पागल कर दे तो अच्छा
गर्मी ए हिज्र अब और ज्यादा सहन नही होती
बरसु खुदा पलकों को बादल कर दे तो अच्छा
9
क्या-क्या हुआ जुदाई में उसे सब बताऊंगा
यारों रात की तन्हाई में उसे सब बताऊंगा
महबूब से आखिर क्या छुपाऊंगा कब तक
मैं पहली ही अंगड़ाई में उसे सब बताऊंगा



कुछ शेर मेरे काबिल दोस्तों के लिए


4
कितनी भी छुपाओ कमजोरी दोस्तों
आखिर पकड़ी जाती है चोरी दोस्तों
बुरे वक्त में किसी का साथ चाहते हो
मत तोडना व्यवहार की डोरी दोस्तों
5
वो कहते है की कबाड़ी है हम
शेरों सुखन में अनाडी है हम
ये तो उनको ही भ्रम है वरना
कब कहा की खिलाडी है हम
6
बाप दादाओं की कमाई हैं
जो आपने ऐश में उड़ाई है
मेहनत से कुछ कमा पहले
फिर बताना क्या महंगाई है

रद्दी होने में किसी को वक्त नही लगता

1
बाहर से जो शख्स सख्त नही लगता
मत सोच गर्म उसका रक्त नही लगता
जवानी ताकत पैसे का गरूर मत करो
रद्दी होने में किसी को वक्त नही लगता

बात दिल से चलकर मुहं से निकलती है
तब जाकर कहीं सोच हर्फों में ढलती है
एक ही दिन में तो कोई सपने नही बुनता
परवाने के बगैर कभी नही शमा जलती है
3
वक्त के सांचे में ढल जाऊंगा रफ्ता-रफ्ता
सहने-तजुर्बों में पल जाऊंगा रफ्ता--रफ्ता
जरा भी चिंता ना करो मेरे हश्र की दोस्तों
कागज़ नही जो गल जाऊंगा रफ्ता रफ्ता